पिछले कुछ दिन भारतीय ट्वीटर के लिये नवसंजीवनी प्रदान करने वाले रहे हैं। जो ट्वीटर ज्यादातर राजनीती के ट्रेंड्स से भरा रहता है, जहां लूटियन दिल्ली की ही आवाज गूंजती है, उस ट्विटर पर भारतीय महीलाओं ने कहर ढाया।

'मी टू' का जलजला इस कदर बरपा की बडी बडी हस्तियां रातों-रात नेस्तनाबूद हो गई, कई करीयर कुछ पलों में खत्म हो गये। 'मी टू' भले ही भारत में थोडी देर से शुरू हुआ, पर जब इसने रफ्तार पकड़ी तो यहीं कहना पडा - 'देर आए, दुरूस्त आए'।

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क्या है 'मी टू'?

'मी टू' का साधारण हिंदी में मतलब होता है 'मैं भी'। इसका उपयोग करने वाला व्यक्ती कहना चाहता हैं की उसके जीवन में किसी मुकाम पर उसे भी कई और लोगों की तरह यौन शोषण या शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पडा है। और अब वह व्यक्ती बोलना चाहता क्यों की आगे जा कर किसी और के साथ वैसा व्यवहार ना हों।

बात शुरु हुई हिंदी और मराठी के बड़े कलाकार नाना पाटेकर से, जिनपर तनुश्री दत्ता ने १० साल पहले फिल्म सेट पर शारीरिक दुर्व्यवहार का आरोप लगाया। उसके बाद तो मानो जैसे किसी ने साइकल स्टेंड पे खडी सेंकड़ों साइकिलों को एक बाजू से धक्का दे दिया हो। धड़ाधड़ साइकिलें गिरने लगीं, बहुत सारे नाम सामने आए।

नाना पाटेकर के बाद कमेडीयन उत्सव चक्रवर्ती, फिल्ममेकर विकास बहल, केंद्रीय मंत्री और पूर्व पत्रकार एम.जे. अकबर, अभिनेता आलोक नाथ और सेंकड़ों नाम सामने आए। कई कंपनीयों को खामीयाजा भुगतना पडा। उत्सव की करतूतों की जानकारी रहतें हुए भी उसके साथ काम करने के लिए तन्मय भट को एआयबी के सीइओ पद से हटना पडा हैं। वहीं विकास बहल पर लगें आरोपों को मद्नजर रखतें हुए 'फैंटम', जो के पार्टनरशिप में उनका प्रोडक्शन हाऊस था उसे ताबड़तोड़ बंद करने का निर्णय लिया गया हैं। उनके 'फैंटम' में पार्टनर रहे निर्देशक अनुराग कश्यप ने भीं विकास पर ठोस कारवाई ना करने के कारण माफी मांगी है।

अगर आप भी वहीं हिंदी गाना सून रहें है और सोच रहें है कि 'हंगामा क्यों है बरपा?' तो मुबारक हो। आपकी सोच सही दिशा में है। हंगामा इसलिए है कि पहली बार इतनी सारी महिलाएं बिना डरें उनके साथ हुए हरेसमेंट का लेखा-जोखा आप के सामने रख रही है।

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Photo by Esteban Lopez / Unsplash

एक पुरूष होने के नाते आपको और मुझे क्या करना चाहिए?

सुनना चाहिए। गौर करना चाहिए की इतनी मात्रा में जब महिलाए कह रहीं है कि उन्हें हमारे साथ सुरक्षित नहीं लग रहा हैं, तो हम शायद गलत है। हमें उन्हें सुन कर अभ्यास करना पड़ेगा। सुधार लाना पड़ेगा।

एक पुरूष होने के नाते आप को और मुझे क्या नहीं करना चाहिए?

'हि टू' जैसे वाहियात ट्रेंड नहीं करने चाहिए। 'मी टू' किसी विशेष लिंग तक सिमीत नहीं हैं। 'मी टू' में स्त्री, पुरूष और LGBTQ कम्युनीटीज भी आतीं है। अपने सोच से इस बेहद संजीदा अभियान की खटिया खड़ी ना करें तो बेहतर होगा। जो बोल रहें है, उन्हें पब्लीसीटी चाहिए कह कर उनका धैर्य मत तोडीयें।

बाकी इतनी सी कहानी है।

'अकेला चला था जानीब-ए-मंजिल मगर, लोग मिलते गए, कारवां बनता गया।'

'मी टू' कारवां भी उसकी मंजिल तक पहुंचे, यही उम्मीद है।

Editor's Note: This is an experimental column by Tejas Ajay Joshi, nicked 'Taj' on The Times Blog. If you wish to submit content in your own regional language, please send a copy to editor@thetimesblog.com today. Hint: You can use Google Input Tools to pen down your next column right now! Please note that we do not accept content that is either overtly religious or political.